अंतर्विरोधों के बीच अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार

“यह एक खुला रहस्य है कि पाकिस्तान हमेशा तालिबान की मदद करता रहा है। न सिर्फ़ पैसों से, बल्कि हथियार और रक्षा उपकरणों के रूप में भी। पाकिस्तान का यह पक्ष कश्मीर घाटी के सन्दर्भ में बहुत अहमियत रखता है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि हमारी सुरक्षा एजेंसियाँ और वहाँ तैनात सेना पाकिस्तान के नापाक इरादों से निपटने में पूरी तरह सक्षम हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के  क़ब्ज़े से कश्मीर में आतंकवाद को नयी हवा मिल सकती है।”

राजेद्र सिंह

लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त)

 

नब्बे के दशक के ज़ख़्म और वर्तमान ख़तरे

नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर में सबसे बड़ी घटनाएँ उस समय घटी हैं, जब अफ़ग़ानिस्तान में 90 के दशक में तालिबान की सत्ता थी। यह वही दौर था, जब कश्मीर में आतंकवाद ने पाँव पसारे। भारत ने आतंकवाद के उसके बाद कई गहरे ज़ख़्म झेले हैं। यहाँ तक कि कारगिल भी उसी काल में हुआ। यही नहीं, भारत की संसद पर हमला भी तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान में रहते हुआ। अपहृत करके कांधार ले जाए गये आईसी 814 विमान की घटना भी उसी दौर में हुई। भारत के लिए चिन्ता की बात यह भी है कि जैश-ए-मोहम्मद का सरगना मसूद अज़हर अगस्त के मध्य में कांधार गया था। आख़िर उसका वहाँ जाने का क्या प्रयोजन था? जैश-ए-मोहम्मद ही नहीं लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन अफ़ग़ानिस्तान में काफ़ी सक्रिय रहे हैं। कश्मीर में इन दो संगठनों का ही आतंकवाद को बढ़ाने में ज़्यादा हाथ रहा है।

भारत के लिए चिन्ता का एक और कारण यह है कि तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा करने के तुरन्त बाद जो सबसे पहला काम किया, वह यह था कि उन्होंने जेलों में बन्द आतंकियों को छोड़ दिया था। इनमें से बड़ी संख्या में वे आतंकवादी थे, जो भारत में सक्रिय रहे और उनका ताल्लुक़ जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयब्बा से रहा है। ऐसे में इन आतंकियों का उपयोग भारत के ख़िलाफ़ होना सम्भव है। लेकिन तालिबान ने फ़िलहाल सीधे-सीधे भारत के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहा है और न ही कश्मीर को लेकर कोई बड़ा विरोधी बयान दिया है। यहाँ कुछ तथ्य और हैं, जो तालिबान के हाथ भारत के ख़िलाफ़ जाने के मामले में बाँधते हैं। एक यह कि तालिबान सही चले, तो भारत के अफ़ग़ानिस्तान में निवेश की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। दूसरे इस बार तालिबान दुनिया के समर्थन का तलबगार दिखता है।

याद रहे तालिबान को 90 के दशक में सिर्फ़ पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई ने मान्यता दी थी। भारत का सहयोग या देश की उसे वैधता तालिबान के लिए बहुत बड़ी बात होगी। निश्चित ही भारत की तरफ़ से भी गोपनीय तरीक़े से बैक चैनल्स (परदे के पीछे के मध्यवर्ती लोगों) के ज़रिये तालिबान से बातचीत की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। भारत ने फ़िलहाल देखो और इंतज़ार की नीति अपना रखी है। हालाँकि यह भी सच है कि भारतीय एजेंसियाँ पिछले एक महीने से देश के कुछ राज्यों में गतिविधियों पर नज़र रख रही हैं। भारत के लिए तालिबान से रिश्ते स्थापित करना कोई आसान काम नहीं होगा। इसका एक कारण यह भी है कि उसने तालिबान से पिछली सत्ता के समय भी कोई रिश्ता या सम्पर्क नहीं रखा था। दूसरे इस बार तालिबान से चीन भी पींगे बढ़ा रहा है, जो पिछली बार नहीं था। चीन पिछले एक साल से सीमा पर भारत से ज़्यादा तनाव बनाया हुआ है। ऐसे में निश्चित ही भारत के लिए चुनौतियाँ बड़ी हैं, ख़ासकर कश्मीर को लेकर।